शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

अपनी ख़ुद्दारी जो दर-दर बेचता रह जाएगा - प्रेम भारद्वाज

अपनी खुद्दारी जो दर दर बेचता रह जाएगा
उम्र भर यूँ ही वह माथा टेकता रह जाएगा

जेब वाले माल मेले से उड-आ ले जायेंगे
कमज़ोर ख़ाली जेब आँखें सेकता रह जाएगा

भक्तजन तो सीस लेकर राह पकड़ेंगे कोई
लेके अपना सा मुँह खाली देवता रह जाएगा

ज्ञान पूरा भी नहीं है साथ पूरा भी नहीं
व्यूह अभिमन्यु अकेला भेदता रह जाएगा

कब तलक लुटती रहेगी बेटियों की असमतें
कब तलक इक बाप यह सब देखता रह जाएगा

क्या मिलेगा प्रेम पाती तब नए डेरे अगर
उसमें वो पिछली ही बस्ती का पता रह जाएगा...

प्रेम भारद्वाज


1 टिप्पणी:

Manu Tyagi ने कहा…

प्रिय ब्लागर
आपको जानकर अति हर्ष होगा कि एक नये ब्लाग संकलक / रीडर का शुभारंभ किया गया है और उसमें आपका ब्लाग भी शामिल किया गया है । कृपया एक बार जांच लें कि आपका ब्लाग सही श्रेणी में है अथवा नही और यदि आपके एक से ज्यादा ब्लाग हैं तो अन्य ब्लाग्स के बारे में वेबसाइट पर जाकर सूचना दे सकते हैं

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