क़िस्सा-ए-महर-ओ-वफ़ा कब का पुराना हो गया,
उनसे बिछड़े भी हमें अब तो ज़माना हो गया,
रात के पिछले पहर देखा था जिनको ख़ाब में,
ज़िंदगी भर अब उन्हें मुश्किल भुलाना हो गया,
प्यार के दो बोल ही तो थे मेरी रुस्वाई के,
इक ज़रा सी बात का इतना फ़साना हो गया,
उनकी ज़ुल्फ़ों की घनेरी छाँव क्या आई के फिर,
देखते ही देखते मौसम सुहाना हो गया,
जिस गली में हिचकिचाते थे कभी जाते हुये,
उस गली में अब 'हसन' का आना जाना हो गया...
हसन रिज़वी
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शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010
तेरी ज़ुल्फ़ों से जुदाई तो नहीं माँगी थी...
तेरी ज़ुल्फ़ों से, जुदाई तो नहीं माँगी थी
क़ैद माँगी थी, रिहाई तो नहीं माँगी थी
मैने क्या ज़ुर्म किया, आप खफ़ा हो बैठे
प्यार माँगा था, खुदाई तो नहीं माँगी थी
मेरा हक़ था तेरी, आंखों की छलकती मय पर
चीज़ अपनी थी, पराई तो नहीं माँगी थी
अपने बीमार पे, इतना भी सितम ठीक नहीं
तेरी उल्फ़त में, बुराई तो नहीं माँगी थी
चाहने वालों को कभी, तूने सितम भी ना दिया
तेरी महफ़िल से, रुसवाई तो नहीं माँगी थी...
हसरत जयपुरी
क़ैद माँगी थी, रिहाई तो नहीं माँगी थी
मैने क्या ज़ुर्म किया, आप खफ़ा हो बैठे
प्यार माँगा था, खुदाई तो नहीं माँगी थी
मेरा हक़ था तेरी, आंखों की छलकती मय पर
चीज़ अपनी थी, पराई तो नहीं माँगी थी
अपने बीमार पे, इतना भी सितम ठीक नहीं
तेरी उल्फ़त में, बुराई तो नहीं माँगी थी
चाहने वालों को कभी, तूने सितम भी ना दिया
तेरी महफ़िल से, रुसवाई तो नहीं माँगी थी...
हसरत जयपुरी
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