मंगलवार, 29 सितंबर 2009

सुन्दरतम कविता

आयो घोष बड़ो व्यापारी,
पोछ ले गयो नींद हमारी
कभी जमूरा कभी मदारी
इसको कहते हैं व्यापारी
रंग गई मन की अंगिया-चूनर
देह ने जब मारी पिचकारी
अपना उल्लू सीधा हो बस
कैसा रिश्ता कैसी यारी
आप नशे पर न्यौछावर हो
मैं अब जाऊँ किस पर वारी
बिकते बिकते बिकते बिकते
रुह हो गई है सरकारी
अब जब टूट गई ज़ंजीरें
क्या तुम जीते क्या मैं हारी
भूख हिकारत और गरीबी
किसको कहते हैं खुद्दारी?
दुनिया की सुंदरतम् कविता
सोंधी रोटी, दाल बघारी

देवेन्द्र आर्य....

हार जाता है

शरीफ इन्सान आखिर क्यों इलेक्शन हार जाता है,
कहानी में तो ये लिखा है रावण हार जाता है।

जुडी हैं इससे तहजीबें ये सब तस्लीम करते हैं,
नुमाइश में मगर मिटटी का बर्तन हार जाता है।

अभी मौजूद है इस गाँव की मिटटी में खुद्दारी,
अभी बेवा की गैरत से महाजन हार जाता है।

अगर एक कीमती बाज़ार की कीमत है ये दुनिया,
तो फिर क्यों कांच की चूड़ी से कंगन हार जाता है।


मुनव्वर राना...

तेरा भी है मेरा भी

गम का खजाना तेरा भी है मेरा भी,
ये नज़राना तेरा भी है मेरा भी,

अपने गम को गीत बनाके गा लेना,
राग पुराना तेरा भी है मेरा भी,

तू मुझको और मैं तुझको समझाऊं क्या,
दिल दीवाना तेरा भी है मेरा भी,

शहरों शहरों गलियों जिस का चर्चा है,
वो अफ़साना तेरा भी है मेरा भी,

मैखाने की बात ना कर वाइज़ मुझ से,
आना जाना तेरा भी है मेरा भी....


शाहिद कबीर...

एक ग़ज़ल...

बात चली तेरी आँखों से, जा पहुंची पैमाने तक,
खींच रही है तेरी उल्फत, आज मुझे मैखाने तक,

इश्क कि बातें, गम कि बातें, दुनिया वाले करते हैं,
किसने शम्मा का दुःख देखा, कौन गया परवाने तक,

इश्क नहीं है तुमको मुझ से सिर्फ बहाने करती हो,
यूँ ही बहाने कायम रखना, तुम मेरे मर जाने तक,

इतना ही कहना है तुमसे, मुमकिन हो तो आ जाना,
आ ही गए तो रुकना होगा, आँखों के पथराने तक..

अज्ञात...

रविवार, 27 सितंबर 2009

दिन आ रहे हैं

नसीब आजमाने के दिन आ रहे हैं,
करीब उनके आने के दिन आ रहे हैं,

जो दिल से कहा है जो दिल से सुना है,
सब उनको सुनाने के दिन आ रहे हैं,

अभी दिलो-जाँ सारे-राह रख दो,
के लुटने-लुटाने के दिन आ रहे हैं,

टपकने लगी है निगाहों से मस्ती,
निगाहें चुराने के दिन आ रहे हैं,

सब्बा फ़िर हमसे पूछती फ़िर रही है,
चमन को सजाने के दिन आ रहे हैं,

चलो "फैज़" फ़िर से कहीं दिल लगायें,
सुना है ठिकाने के दिन आ रहे हैं......

(फैज़ अहमद फैज़)

बोलता है..

मेरी दीवार, मेरा दर बोलता है,
वो आ जाए तो घर बोलता है,

इलाही खैर हो कातिल की मेरी,
सुना है ये खंजर बोलता है,

ये एजाज है उसकी गुफ्त-गु का,
मुखातिब हो तो पत्थर बोलता है,

शराफत का पता चलता है उसकी,
वो जब गुस्से में भर कर बोलता है,

छुपाऊं इस गरीबी को कहाँ तक,
जरा सी बारिश हो तो छप्पर बोलता है....

-नवाज देवबंदी साहब

_____WELCOME______

वो आए घर हमारे खुदा कि कुदरत है॥
कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं....